Voter Deletion: आपका वोट कुछ ही सेकंड में डिलीट किया जा सकता है सबूत यहाँ है

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मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि सत्ताधारी पार्टी विपक्ष के नेता द्वारा लगाए गए आरोपों से क्यों बच रही है। यह अत्यंत गंभीर मामला है, क्योंकि हमारा लोकतंत्र स्पष्ट रूप से खतरे में है। समस्या को सामूहिक रूप से हल करने के बजाय, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) इन दावों को नकार रहे हैं और भाजपा उनका समर्थन कर रही है।

मामला क्या हुआ और क्यों यह चिंताजनक है

आपने जो वर्णन किया है वह सीधा और परेशान करने वाला है: आलंद विधानसभा क्षेत्र में 6,018 वोट डिलीट होने का खुलासा हुआ — एक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने अपने चाचा का वोट गायब देखा और जब गहराई से देखा तो पता चला कि यह किसी पड़ोसी से जोड़ कर डिलीट हुआ दिखाया गया था। न तो वोट देने वाले को और न ही जिस ठप्पे पर नाम जुड़ा दिखाया गया,

किसी को जानकारी थी। सबसे भयावह बात यह है कि यह सिर्फ व्यक्तिगत गड़बड़ी नहीं दिखती — क्योंकि डिलीशन्स विभिन्न राज्यों के मोबाइल नंबरों से की गईं, और निशाना खास तौर पर एक राजनीतिक पक्ष के मतदाता बने। अगर यह सच है तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव पर सवाल है।

कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र का मामला इस चौंकाने वाली हकीकत को सामने लाता है:

  • 6,018 वोट डिलीट किए गए।
  • एक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को तब समस्या का पता चला जब उसने देखा कि उसके चाचा का वोट डिलीट हो गया है।
  • जांच करने पर पता चला कि यह डिलीशन उसके पड़ोसी से जोड़ा गया है।
  • लेकिन असलियत में यह पड़ोसी नहीं था। न ही वोट डिलीट होने वाले व्यक्ति को, और न ही जिस पर डिलीट करने का ठप्पा लगा, किसी को कोई जानकारी थी।
  • सच्चाई यह है: सॉफ्टवेयर ने पूरी प्रक्रिया को हाईजैक कर वोट डिलीट कर दिए।
  • और चौंकाने वाली बात यह है कि कर्नाटक के बाहर, अलग-अलग राज्यों के मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल आलंद में वोट डिलीट करने के लिए किया गया—खास तौर पर कांग्रेस मतदाताओं को निशाना बनाते हुए।

लोकतंत्र की प्रामाणिकता पर तकनीकी खतरे का अर्थ

डिजिटल औजारों ने प्रशासनिक काम आसान किए हैं, पर जब वही औजार वोटर-डेटा को सेकंडों में बदल या मिटा सकते हैं, तब लोकतंत्र संकट में आ जाता है। आप जिस तरह से बताते हैं कि सॉफ्टवेयर ने पूरी प्रक्रिया हाईजैक कर दी —

यह दर्शाता है कि तकनीक का दुरुपयोग मात्र मानवीय धोखे से कहीं बड़ा और संरचित रूप ले सकता है। वोटिंग का अधिकार केवल कागज या स्क्रीन का मामला नहीं; यह नागरिकों की आवाज़ है। यदि कोई तंत्र कुछ ही सेकंड में वोट डिलीट कर सकता है और व्यक्ति को इसकी भनक भी न लगे, तो चुनावी विश्वास टूट जाता है। इसलिए तकनीकी जोखिम को मामूली नहीं लिया जा सकता।

CEC और संस्थागत जवाबदेही पर प्रश्न

आपकी चिंता बिल्कुल वाजिब है: जब संवैधानिक संस्थाएँ, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त, आरोपों को सिरे से खारिज कर देती हैं और जवाबदेही नहीं दिखती, तो जनता का भरोसा कमज़ोर पड़ता है। जवाबदेही और पारदर्शिता लोकतंत्र के बुनियादी स्तंभ हैं

जिन्हें चुनिंदा खारिजियों से बहाल नहीं किया जा सकता। यदि CEC पूरी तरह से जांच-पड़ताल के लिये खुला मंच नहीं देता, लॉग्स साझा नहीं करता या स्वतंत्र ऑडिट की राह नहीं देता, तो वही संस्थागत अविश्वास बढ़ता है जो लोकतांत्रिक प्रणाली के लिये सबसे खतरनाक है। नागरिकों की मांगें वैधानिक और पारदर्शी होनी चाहिए।

सबूत और जांच क्या माँगा जाना चाहिए

आपने जोर इस बात पर दिया कि वास्तविक जांच के बिना शोर-शराबा ही रह जाएगा। बिलकुल सही—अगर यह ज्यादातर तकनीकी प्रक्रिया है तो निर्णायक सबूत होंगे: सिस्टम-लॉग्स, ऑडिट-ट्रेल, किस मोबाइल/आईपी से परिवर्तन हुए, BLO/RO के लिखित बयान और सर्वर-स्तर की फॉरेंसिक रिपोर्ट। इन बुनियादी चीज़ों के बिना सवालों का हल नहीं निकलता। नागरिकों और निगरानी निकायों को मिलकर इन दस्तावेजों की माँग करनी चाहिए, ताकी आरोप सत्यापित हो सकें या खारिज। केवल बयानबाजी से भरोसा नहीं बनता।

नागरिकों का कर्तव्य जागरूकता और सामूहिक दबाव

आपने सही कहा: समस्या को सामूहिक रूप से हल करना होगा। नागरिकों को अपने मतदाता रजिस्टर की नियमित जाँच करनी चाहिए, स्थानीय BLO/RO से लिखित पुष्टि लेनी चाहिए और यदि संभावित अनियमितता दिखे तो सामूहिक रूप से संविधानिक संस्थाओं से स्वतन्त्र फॉरेंसिक ऑडिट की माँग करनी चाहिए। राजनीतिक दलों से आगे बढ़कर नागरिक समाज और स्वतंत्र समूहों को भी आगे आना चाहिए। सार्वजनिक दबाव, जनहित याचिकाएँ और पारदर्शिता की माँग ही संस्थाओं को जवाबदेह बना सकती है।

निष्कर्ष लोकतंत्र बचाने का तत्काल आह्वान

आपने जो भाव रखा है वह स्पष्ट है: यह सिर्फ एक इलाका या एक पार्टी का मामला नहीं है — यह हमारे लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा संकट है। जब संस्थाएँ जवाबदेही नहीं दिखातीं, तो नागरिकों को संवैधानिक उपाय अपनाकर, संगठित होकर और सत्य की माँग कर इसके विरुद्ध खड़ा होना होगा। यदि तकनीक हमारे वोटों पर नियंत्रण कर सकती है, तो हमें न केवल तकनीकी सुरक्षाएँ बल्कि पारदर्शी संस्थागत प्रक्रियाएँ और सार्वजनिक निगरानी भी मजबूत करनी होगी। यही लोकतंत्र की रक्षा का असली रास्ता है।

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