नमस्कार दोस्तों, देश की जनता अब सवाल पूछ रही है – क्या GST सच में सुधार लाने के लिए आया था या फिर जनता की जेब खाली करने के लिए? पिछले 8 सालों में 127 लाख करोड़ रुपए की वसूली ने आम आदमी की नींद उड़ा दी है। इस आर्टिकल में हम आपके लिए लेकर आए हैं GST की पूरी सच्चाई, जिसे जानकर आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।
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GST की शुरुआत और वादों का सच
जब 2017 में GST लागू किया गया था, तब इसे “One Nation One Tax” का नाम देकर जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए। दावा किया गया था कि टैक्स व्यवस्था सरल होगी और महंगाई कम होगी। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली। छोटे व्यापारियों को टैक्स स्लैब की जटिलता ने परेशान कर दिया और आम जनता के खर्चे और बढ़ गए। आज स्थिति यह है कि लोग पूछ रहे हैं – सुधार कहां है?
127 लाख करोड़ की वसूली आम आदमी की जेब पर चोट
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीते 8 सालों में GST के नाम पर जनता से लगभग 127 लाख करोड़ रुपए वसूले गए। इतनी बड़ी रकम सुनकर ही आम आदमी हैरान है। सवाल ये उठता है कि आखिर इस पैसे का इस्तेमाल कहां हुआ? जनता महंगाई की मार झेल रही है, जबकि सरकार इसे ‘विकास का इंजन’ बताती है। असल में ये बोझ सीधे तौर पर आम आदमी की कमर तोड़ चुका है।
गरीब और मध्यमवर्ग पर सीधा असर
GST के टैक्स स्लैब ने सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यमवर्ग पर डाला है। खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान तक हर जगह GST लगाया गया। इससे हर महीने का खर्चा बढ़ गया। गरीब जहां पेट भरने की जद्दोजहद में लगा है, वहीं मध्यमवर्ग EMI और घर के बजट में उलझा पड़ा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या GST का बोझ सही मायनों में गरीबों पर लादा गया?
क्या वाकई टैक्स कम हुआ है?
सरकार का दावा है कि पुराने जमाने में गरीबों पर ज्यादा टैक्स लगता था और अब GST ने बोझ कम कर दिया है। लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट और आंकड़े इससे पूरी तरह उलट बताते हैं। कुल 127 लाख करोड़ की वसूली में करीब 64% GST सीधे गरीबों से लिया गया, यानी लगभग 80 से 84 लाख करोड़ गरीब और मध्यमवर्ग की जेब से निकाले गए। बाकी का बड़ा हिस्सा बड़े बिजनेस और कॉर्पोरेट्स से वसूला गया। यानी आम आदमी पर टैक्स का असली बोझ बढ़ा, जबकि बड़े व्यापारियों पर असर अपेक्षाकृत कम रहा। इस रियलिटी ने दिखा दिया कि GST सुधार के नाम पर जनता की जेब पर सबसे भारी मार है।
पत्रकारों के सवाल और खुलासे
पत्रकार संदीप चौधरी जैसे लोगों ने मंच पर आकर सवाल खड़े किए कि आखिर जनता से वसूले गए 127 लाख करोड़ का हिसाब कौन देगा? ऐसे पत्रकार ही सच्चाई को उजागर कर रहे हैं, जबकि कई मीडिया हाउस केवल सरकार की तारीफ में व्यस्त हैं। यही कारण है कि जनता अब स्वतंत्र पत्रकारिता की तरफ झुक रही है और सच जानना चाहती है।
BJP की नीतियों पर उठते सवाल
बीते कुछ सालों में BJP की नीतियों पर लगातार सवाल उठे हैं। GST को “ऐतिहासिक सुधार” कहा गया, लेकिन परिणाम आम जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। विरोधियों का आरोप है कि GST ने छोटे व्यापारियों और गरीबों की कमर तोड़ दी। अब जब वसूली का आंकड़ा सामने आया है, तो इस नीति की पारदर्शिता और मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता की नाराज़गी और विरोध
GST की मार से परेशान जनता अब सोशल मीडिया पर अपनी आवाज़ उठा रही है। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं, लेकिन सरकार इसे “विकास” का हिस्सा बताती रही। जनता का कहना है कि अगर यही सुधार है तो इससे बेहतर पुरानी टैक्स व्यवस्था थी। अब जनता बदलाव की मांग कर रही है और कह रही है – “बस बहुत हुआ, अब हिसाब चाहिए।”
क्या बदलाव की जरूरत है?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या GST को सुधार की जरूरत है? विशेषज्ञ मानते हैं कि टैक्स स्लैब सरल होने चाहिए और जरूरी सामानों को पूरी तरह GST से मुक्त कर देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो महंगाई और बढ़ेगी और जनता का गुस्सा और भड़केगा। अब वक्त आ गया है कि सरकार जनता की आवाज सुने और GST को जनता के हित में ढाले।
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