Assam Adani Land Deal: नमस्कार दोस्तो! आज हम आपके सामने एक ऐसा धमाकेदार खुलासा लेकर आए हैं, जिसे सुनकर हर जागरूक नागरिक का खून खौल उठेगा। असम की भाजपा सरकार ने अडानी ग्रुप को सीमेंट फैक्ट्री के नाम पर 3000 बीघा ज़मीन गुपचुप तरीके से दे डाली, और जब मामला कोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट के जज तक चौक पड़े – “क्या आप पूरा ज़िला ही दे रहे हैं?” यह सिर्फ जमीन की डील नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के माथे पर पड़ा एक बड़ा दाग है। इसलिए इस पोस्ट को अंत तक ज़रूर पढ़िए, बीच में छोड़ दिया तो तड़कता हुआ सच मिस हो जाएगा
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3000 बीघा ज़मीन की डील क्या ये सरकार है या रियल एस्टेट एजेंसी?
असम की भाजपा सरकार ने अडानी ग्रुप को सीमेंट फैक्ट्री बनाने के नाम पर 3000 बीघा यानी 81 मिलियन sq.ft. ज़मीन दे दी है। सोचिए – ये किसी छोटे प्लॉट की बात नहीं, बल्कि एक छोटे ज़िले जितनी जमीन है! लोगों को भनक तक नहीं लगी और कागज़ों पर पूरा खेल निपटा दिया गया। सवाल यह उठता है कि क्या पब्लिक की ज़मीन पर अब सीधे कॉरपोरेट का कब्ज़ा करवाया जाएगा? सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं – “हेमंता अब Adani के एजेंट की तरह काम कर रहा है, मुख्यमंत्री की तरह नहीं।” इससे असम की जनता में गुस्सा लगातार बढ़ रहा है।
हाईकोर्ट के जज भी चौंक गए “क्या आप पूरा जिला दे रहे हैं?
यह मामला जब गुवाहाटी हाईकोर्ट में पहुंचा तो जज भी हैरान रह गए। उन्होंने सरकार से सीधा सवाल किया – “क्या ये कोई मज़ाक है? क्या आप पूरा ज़िला दे रहे हैं?” कोर्ट को भी यकीन नहीं हो रहा था कि एक फैक्ट्री के लिए इतनी बड़ी जमीन कैसे दी जा सकती है। इससे साफ पता चलता है कि सरकार ने बिना पारदर्शिता के इस डील को पास किया। विपक्ष पहले से आरोप लगा रहा था कि सब कुछ “अडानी प्रेम” में किया जा रहा है, और अब कोर्ट की टिप्पणी ने उस आरोप को और मजबूत कर दिया है।
बिना टेंडर और पब्लिक नोटिस डील को क्यों गुप्त रखा गया?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस 3000 बीघा जमीन की डील के लिए कोई टेंडर जारी नहीं हुआ, न ही पब्लिक नोटिफिकेशन निकला। सब कुछ चुपचाप कागज़ों पर फाइनल कर दिया गया। जमीन की कीमत तक सार्वजनिक नहीं बताई गई। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह डील वाकई जनता के हित में होती, तो सरकार इसे छुपाती नहीं। गुप्त तरीके से जमीन ट्रांसफर करना यह दिखाता है कि कहीं न कहीं मामला संदिग्ध है।
कौन सा फायदा मिला अडानी को और कितना नुकसान जनता को?
3000 बीघा जमीन का बाजार मूल्य हज़ारों करोड़ रुपये का है। लेकिन सरकार ने इसे औद्योगिक रेट पर, बेहद सस्ती कीमत में ट्रांसफर कर दिया। यानी सीधा-सीधा पब्लिक प्रॉपर्टी को कॉरपोरेट के हाथों सौंप दिया गया। दूसरी तरफ, स्थानीय किसान जिनकी ज़मीनें पास में हैं, अभी भी मुआवज़े के लिए भटक रहे हैं। यह “विकास” नहीं बल्कि पूरी तरह कॉरपोरेट फेवरिज़्म लगता है – और जनता अब इसे समझने लगी है।
जनता में जबरदस्त गुस्सा सोशल मीडिया पर हेमंता सरकार के खिलाफ भड़की आग
असम के युवाओं और छात्रों में इस डील को लेकर भारी नाराज़गी है। ट्विटर से लेकर फेसबुक तक AdaniDealScam ट्रेंड कर रहा है। लोग पूछ रहे हैं – “क्या राज्य की जमीन अब कॉरपोरेट को बेचने के लिए रखी गई है?” कई जगहों पर छात्रों और सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिए हैं। एक यूजर ने लिखा – “हेमंता ने असम को बेच दिया, अब जनता ही इसका हिसाब लेगी।”
क्या हेमंता बिस्वा सरमा की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील आने वाले समय में हेमंता सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनने वाली है। पहले से ही उन पर कई पुराने भ्रष्टाचार मामलों के आरोप लगे हैं और अब इस डील ने उनकी छवि को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। विपक्ष ने साफ कह दिया है कि सत्ता बदलेगी तो इस डील की जांच होगी और दोषियों को जेल भेजा जाएगा। जनता के बीच माहौल ऐसा बन रहा है कि “हेमंता का अंत निकट है” – लोग कह रहे हैं कि यह घोटाला उन्हें सत्ता से बाहर कर देगा।
कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग क्या डील रद्द होगी?
विपक्षी पार्टियां और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि इस पूरे मामले की कोर्ट की निगरानी में जांच हो और 3000 बीघा जमीन ट्रांसफर वाली डील को तुरंत रद्द किया जाए। कई नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ “भूमि घोटाला” नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों पर हमला है। अगर यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाता है और सही तरीके से जांच होती है, तो संभव है कि अडानी को दी गई जमीन वापस लेनी पड़े। इससे सरकार की बड़ी बेइज्जती होना तय है।
आगे क्या? जनता की जागरूकता तय करेगी सत्ता की दिशा
अब यह पूरा मामला असम की जनता के सामने है। अगर जनता इस मुद्दे को ज़िंदा रखती है और लगातार सवाल उठाती है, तो सरकार के लिए इसे दबाना मुश्किल हो जाएगा। आने वाले चुनावों में यह “अडानी वाली डील” सबसे बड़ा मुद्दा बन सकती है। लोग कह रहे हैं – “अगर आज जमीन चली गई तो कल पूरा असम बिक जाएगा।” इसलिए अब सबकी नजर जनता और कोर्ट दोनों पर है – यहीं से तय होगा कि लोकतंत्र जीतता है या कॉरपोरेट दबदबा।
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